12 अप्रैल 2010

पूर्वांचलीय भाषा, हिंदी और देवनागरी लिपी

ज़ाकिर हुसैन
पी-एच.डी. हिंदी तुलनात्मक साहित्य

वर्तमान रूप में हिंदी इतनी सर्वग्राही तथा लचीली है कि वह प्राय: सभी प्रकार के प्रचलित भावों, ज्ञान-विज्ञान एवं प्रचलित शब्दों को अपनाने में समर्थ हैं। हिंदी भाषा अपनी गर्भ में सभी भाषाओं के शब्दों को पचाने में जितनी समर्थ है उतनी कोई भाषा नहीं। संस्कृत की सहायता ने तथा विद्वानों के प्रयत्न ने इसका शब्द-भंडार अत्यंत व्यापक तथा बहुद्देश्यपूर्ण बना दिया। संस्कृत साहित्य की व्याकरण संबंधी जटिलता हिंदी में घट गयी है। इस भाषा में 'रामचरितमानस', 'सूर-सागर', बिहारी सतसई', 'प्रिय-प्रवास', 'कामायनी' जैसे महान ग्रंथ बन चुके हैं। आज हिंदी के प्रौढ़ विद्वान अब भारत में हीं नहीं , अपितु विदेशों में भी हैं।

जब मन में सवाल खड़ा होता है कि हिंदीतर अर्थात पूर्वोत्तर प्रदेश में प्रचार -प्रसार की क्या स्थिति रही तथा उन प्रदेशों की भाषाओं के विकास में हिंदी की क्या भूमिका रही है? तब इन सवालों के सही उत्तर खोजने के लिए इन भाषाओं के अंतरसंबंधों की चर्चा करना जरूरी है। पर यह विषय इतना व्यापक है कि समयाभाव से इसकी खुलकर चर्चा करना संभव नहीं है, इसलिए जहां तक संभव है संक्षेप में इस विषय पर चर्चा करने का प्रयास किया गया है।

पूर्वोत्तर भारत में हिंदी के प्रचार -प्रसार को देखते हुऐ इसे '' क्षेत्र के नाम से घोषित किया गया है। जो पूर्णरूप से हिंदीतर प्रदेश है। जिसे सात बहनों के राज्य के नाम से जाना जाता है। संविधान सभा ने जिस समय इस क्षेत्र को '' क्षेत्र के रूप में घोषित किया है,तब से अब तक इस क्षेत्र की स्थिति काफी सुधरी है। पहले से अब ज्यादा हिंदी में साहित्य रचे जा रहें हैं। सरकारी, गैर-सरकारी सभी कार्यलयों में हिंदी के इस्तेमाल में काफी वृध्दि हुई है। प्रिंट मीडिया एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया में हिंदी ने काफी जगह बना ली है। इसके अतिरिक्त प्राचीन काल में महापुरूष शंकरदेव तथा उनके समसामयिक समस्त रचनाएं ब्रज भाषा में हुई। इस प्रकार पूर्वोत्तर राज्यों में हिंदी का संपर्क पूर्वोत्तरीय सभी भाषाओं के साथ हो रहा है। ज्ञान-साहित्य के क्षेत्र में ये भाषाएं एक-दूसरे से आदान-प्रदान करके अपने साहित्य भंडार को समृध्द कर रहा है।

पूर्वोत्तर राज्यों के साथ बाहरी राज्यों का संपर्क आरंभ से ही रहा है। इन राज्यों में व्यापारिक व सेना-सुरक्षाबल के सैनिकों के कारण तथा मारवाड़ियों से राष्ट्रीय एकता एवं सुरक्षा की भावना के साथ राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार का काम भी अनौपचारिक रूप से सुरक्षित रहा । पूर्वी उत्तर प्रदेश (गाजीपुर,बलिया,आरा,मऊ,आजमगढ़) से श्रमजीवी के रूप में आए लोगों से संपर्क के लिए हिंदी भाषा का व्यवहार किया । आवश्यकतावश कभी वे यहां की भाषा सीखी और अपनी भाषा यहां के लोगों को सिखायी। इसप्रकार भाषाई लेन-देन चलता रहा। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने साथ 'रामचरित मानस' तथा ग्रंथों के उपहारों से इसे हिंदीमय बना दिया। हिंदी भाषा का इस प्रकार धीरे-धीरे पूर्वोत्तर में फलना-फूलना शुरू हुआ।

पूर्वांचल में वास्तविक रूप का पदार्पण तब हुआ, जब सन 1934ई.में 'अखिल भारतीय हरिजन सेवा संघ' की स्थापना हेतु महात्मा गांधी असम आये। उन्होंने जगह-जगह संबोधनों में असमिया को हिंदी से परिचित होने की बात कही थी, उनके प्रत्युत्तर में गड़ मुड़ सर्वाधिकार श्री श्री पीतांबर देव गोस्वामी ने सूचित किया था कि 'यहां हिंदी सिखाने वालों की कमी है। अत: यदि यह व्यवस्था हो जाए, तो हम हिंदी शिक्षा की व्यवस्था करेंगे।' इससे गांधी जी संतुष्ट होकर बाबा राघवदास को हिंदी प्रचारक के रूप में नियुक्त करके असम भेजा। उनकी संतमय, तेजोमय तथा तपस्वी जीवन से पूर्वांचल सदा गौरवान्वित है।

प्रत्यक्ष रूप में तो नहीं पर परोक्ष रूप में देखा जाता है कि जिन भाषाओं की लिपि देवनागरी है, वह भाषा हिंदी न होते हुए भी उस भाषा के जरिए हिंदी भाषा का प्रचार संभव हो सका है। उदाहरण के रूप में अरूणाचल में मोनपा, मिजि, और अका, असम में मिरि, मिसमि और बोड़ो, नागालैंड में अडागी, सेमा, लोथा, रेग्मा, चाखे तांग फोम तथा नेपाली, सिक्किम में नेपाली लेपचा, भड़पाली, लिम्बू आदि भाषाओं के लिए देवनागरी लिपि है। देवनागरी लिपि अधिकांश भारतीय लिपियों की जननी रही है। अत: इसके प्रचार-प्रसार के पूर्वोत्तर में हिंदी शिक्षा का सुगम हो गया।

असम में बोड़ो भाषा के लिपि के लिए अनेक राजनीति चली। अंतत: यह राजनीति तब समाप्त हुई जब उस समय की तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी जी ने बोड़ो भाषा के लिए 'देवनागरी लिपि' की प्रयोग के लिए अनुमति दी। परिणामत: यह हुआ कि फिलहाल बोड़ो भाषा के लिए 'देवनागरी लिपि' का प्रयोग हो रहा है। इस क्षेत्र में इस विषय से संबंधित बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक अध्ययन हो रहे हैं। जिसके लिए देवनागरी के संशोधन के बाद बोड़ो भाषा के लिए उपयोगी साबित हुई है। अभी असम की भाषाओं में 'बोड़ो'चीनी परिवार की ही भाषा है, जिसके लिए 'नागरी'प्रयोग हो रहा है।

पूर्वांचल के निर्देशक के रूप में सुशील कुमार चौधरी कार्यरत है। दनके प्रयास से निम्नलिखित हिंदी के क्षेत्रीय कार्यालयों के संचालन हो रहे

हैं-

क्रम संख्या

संस्था का नाम

मान्यता प्राप्त परीक्षा का नाम

1.

असम राज्य राष्ट्रभाषा प्रचार समिति

1.प्रथमा 2.प्रारंभिक 3.प्रवेश

4.परिचय 5.कोविद 6.रत्न

2.

मेघालय राष्ट्रभाषा प्रचार समिति

..........

3.

मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति

..........

4.

त्रिपुरा राष्ट्रभाषा प्रचार समिति

..........

5.

नागालैंड राष्ट्रभाषा प्रचार समिति

..........

उपर्युक्त संस्‍थाओं के अतिरिक्त पूर्वांचल में और तीन स्वैच्छिक हिंदी संस्था है :-

क्रम संख्या

संस्था का नाम

मान्यता प्राप्त परीक्षा का नाम

1.

असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गुवाहाटी

1.प्रबोध 2.विशारद 3.प्रवीण

2.

म्णिपुर हिंदी परिषद, इंफाल

1.प्रबोध 2.विशारद 3.रत्न

3.

मिजोरम हिंदी प्रचार सभा, आइजोल

1.प्रबोध 2.विशारद 3.प्रवीण

उल्लिखित संस्थाओं के जरिए पूर्वांचल में सौ-सौ ज्यादा हिंदी विद्यालयों का संचालन हो रहा है, जिसमें हर सौ-सौ छात्र-छात्राएं हिंदी में परीक्षा पास करके रोजगार प्राप्त कर रहें हैं। पूर्वांचल में विभिन्न जाति-जनजाति निवास करती है। उनकी भाषा अलग-अलग हैं। ऐसी स्थिति में अनुवाद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। एक भाषा का साहित्य दूसरी भाषा में अनुवाद करके रसास्वादन करना आसान है इससे एक-दूसरे की भाषा,कला-संस्कृति, रीति-रिवाज को जानना समझना सुगम होता है। हिंदी भाषा इस क्षेत्र में पूर्वांचल के लिए अनुवाद की भाषा बनकर महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। हम ऐसे देखते हैं कि असमिया ,बोड़ो,कार्बी,राभा,बंगला,नेपाली, आदि साहित्यों के हिंदी में अनुवाद के बाद ही अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त होती है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि पूर्वांचल की भाषाओं के विकास में हिंदी की अहम भूमिका रही है।

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